Bodhghat Project

बस्तर जिले में नगरनार स्टील प्लांट और बोधघाट परियोजना एसी आद्योगिक इकाईयां हैं बस्तर संभाग में हैं और लोग उनके बारे में काफी जानना चाहते हैं । नगरनार जो जगदलपुर शहर से महज 18 किमी दूर उड़िसा रोड पर है। तो बोधघाट परियोजना गीदम से महज 20 किमी दूर बारसूर नामक एक एतिहासिक नगरी पर प्रस्तावित थी।

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फिलहाल बात करते हैं बोधघाट परियोजना के बारे में । यहाँ नाग वंशीय शासकों के बनाए अवशेष आज भी आकर्षण का केंन्द्र हैं क्योंकि इस क्षेत्र में बने 10 वीं और 11 सदी के बने मंदिर आज भी लोगों को आकर्षित करते हैं ।
सन् 1979 में बारसूर में पहली बार इस परियोजना की बुनियाद रखी गई । उस वक्त मोरारजीदेसाई भारत के प्रधानमंत्री थे । देसाई सरकार की मंषा यह थी कि 475 करोड़ रूपये की लागत से इस परियोजना में 124 मेगावाट की चार बिजली यूनिट बनाई जाए।
यहाँ 90 मीटर का ऊँचा बांध भी बनाया जा रहा था। जो आज सात धार के नाम से मशहूर है। इसकी तैयारियाँ हो चुकी थी । ढांचे तैयार किए जा रहे थे ।
परियोजना के मद्देनजर यहां कबाड़ बन चुके पक्की सड़के, सैकड़ों आवास इस बात के गवाह हैं कि यह परियोजना कितनी बड़ी थी। तो सवाल यह उठता है कि यह परियोजना बंद कैसे हो गई ? वे क्या अड़चने थी जिससे सरकार को इतनी महती परियोजना को बंद करना पड़ा?

  1. पहला कारण वन और पर्यावरण पेचिंदिगियों के चलते यह बंद हो गई ।
  2. दूसरा बंद होने का कारण यह था कि परियोजना के चलते प्रभावितों को सरकार मुआवजा देने की बात पर अड़ी रही । उनके पुर्नवास पर कोई विचार तत्कालीन सरकार ने नहीं रखे थे।

इन्हीं बिन्दुओं पर राजनेताओं ने समय-समय इसके लिए खूब राजनीति भी की। फिर परियोजना ठंडी पड़ गई । अब यह परियोजना के अवशेष यानि चैड़ी सड़के, आवास ही दिखाई देते हैं । उसे भी लोग देखने जाते हैं । और ये देखते हैं कि अगर यह परियोजना पर काम हो गया होता तो आज बारसूर शायद कोरबा, और भिलाई के मुकाबले का शहर होता । और निर्माण कार्य में जो रूपया लगा वह भी बर्बाद हो गया।

नए सिरे से होगा बोधघाट परियोजना

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अब कोरोना काल में इस परियोजना को लेकर नए सिरे से काम होने जा रहा है। मुख्यमंत्री ने एक बैठक आहूत की जिसमें सांसद,सभी विधायक और अन्य जनप्रतिनिधियों ने सुझाव दिए।

इस बैठक के प्रमुख बिन्दुएं इस प्रकार है।

परियोजना शुरू होने से पहले पुनर्वास नीति बनना चाहिए। सीएम बघेल ने कहा कि बस्तर के लोगों को विश्वास में लेकर योजना को आगे बढ़ाया जाएगा। उन्होंने कहा कि प्रभावित लोगों के रोजगार, मकान और जमीन के बदले जमीन की व्यवस्था की जाएगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि बोधघाट ऐसा पहला प्रोजेक्ट है, जो बस्तर के विकास और समृद्धि के लिए है। इसका सीधा फायदा बस्तरवासियों को मिलेगा।

इसमें एक अहम बिन्दु ये निकल कर आती है वह यह कि यह परियोना अब बिजली उत्पादन नहीं करेगी बल्कि खेतों में सिंचाई करेगी।

ये आसान नहीं है।

निम्न कारणों से इसका विरोध अब भी होगा ।

ग्रामीणों से इस परियोजना के बारे में नहीं पूछा गया है । और न ही इस संबध में कोई ग्राम सभा आयोजित की गई है। क्योंकि अब किसी भी बडे काम को करने के लिए ग्राम सभा की अनुमति अनिवार्य है।

जनिए क्या है ग्राम सभा ? क्या पेचिदिगियां है ग्राम सभा की ? राजाराम तोड़ेम की माने तो । इसमें प्रभातिव जो क्षेत्र है वे सभी सरकारी जमीन हैं जिसमें जंगल हैं यानि जंगल काटे जाएंगे और जो प्रभावित हैं वे तो अप्रभावित ही रह जाऐगे।

क्या है नेताओं का रूख और बैठक में लिए गए निर्णय

बोधघाट परियोजना से बस्तर संभाग के अत्यंत पिछड़े जिले सुकमा, दंतेवाड़ा और बीजापुर में सिंचाई की सुविधा विकसित होगी। एक छोटा सा हाईडल पॉवर प्लांट भी लगना चाहिए। ताकि बाकी जिलों में बिजली की आपूर्ति हो सकेगी। इस परियोजना के पूरा होने से सवा तीन लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई होगी। आबकारी मंत्री ने कहा कि आम लोगों के बीच जाकर भी सुझाव लिए जाएंगे। पूर्व केन्द्रीय मंत्री अरविन्द नेताम को भी आमंत्रित किया गया था। वे पहले इस परियोजना का विरोध करते रहे हैं। चूंकि अब सिंचाई प्राथमिकता है, इसलिए यह जरूरी है।

मंत्रियों के सुझाव- आकर्षक पुनर्वास पैकेज और प्रभावितों के लिए व्यवस्थापन नीति बने जो पहले की परियोजना में नहीं थी। जल संसाधन मंत्री रविन्द्र चैबे ने कहा कि इससे बस्तर की अर्थव्यवस्था में बदलाव आएगा। वन मंत्री मो. अकबर ने प्रोजेक्ट को चरणबद्ध तरीके से पूरा करने का सुझाव दिया , उद्योग मंत्री कवासी लखमा ने कहा कि परियोजना से प्रभावितों को बताना होगा कि उनको क्या लाभ मिलेगा।

साथ ही प्रोजेक्ट शुरू करने से पहले व्यवस्थापन के लिए जमीन का चिन्हांकिंत किया जाए।

राजस्व मंत्री जयसिंह अग्रवाल ने कहा कि आम जनता से चर्चा कर पुनर्वास नीति तय की जाएगी।

कितना होगा उत्पादन ?

 

  • 300 मेगावाट बिजली, 3.66 लाख हेक्टेयर में होगी सिंचाई
  • इकोनॉमी में 6 हजार 223 करोड़ रुपए की बढ़ोत्तरी होगी।
  • इंद्रावती नदी के 300 टीएमसी जल का उपयोग हो सकेगा । वर्तमान में मात्र 11 टीएमसी जल का उपयोग हो रहा है। यानि बहुत कम उपयोग हो रहा है।
  • इससे 3 लाख 66 हजार हेक्टेयर में सिंचाई
  • इसके 500 मिलियन घनमीटर जल का उपयोग उद्योग और 30 मिलियन घनमीटर पेयजल के लिए उपयोग में लाया जाएगा।
  • इससे हर साल 4824 टन मछली का भी उत्पादन हो सकेगा। इस प्रोजेक्ट से 359 गांव लाभान्वित होंगे, जिसमें दंतेवाड़ा के 51, बीजापुर के 218 और सुकमा के 90 गांव शामिल हैं।

साथ ही प्रोजेक्ट से 28 गांव पूरी तरह और 14 गांव आंशिक रूप से डूबान में आएंगे। इसमें 5704 हेक्टेयर वन, 5010 हेक्टेयर निजी तथा 3068 हेक्टेयर शासकीय जमीन शामिल हैं।

बोधघाट परियोजना और आंध्रप्रदेष की पोलावरम् परियोजना में अंतर

कुल जल ग्रहण की बात कहें तो
प्रस्तावित बोधघाट में 15280.90 वर्ग किमी. पोलावरम् में 306643 वर्ग किमी. का जलअधिग्रहण है। और वहीं जलाषय का विवरण में बांध का उच्च स्तर बोधघाट का 471 मी. पोलावरम् 53.32मी.। उपयोगी जल भण्डारण में बोधघाट में 3715.40 मि.घ.मी. पोलावरम् में 2130 मि.घ.मी.। पूर्ण जल स्तर डूबान क्षेत्र के अन्तर्गत बोधघाट 13783.147 हेक्टेयर पोलावरम् में 47367.18 हेक्टेयर। सिंचाई क्षमता में बोधघाट से 366580 हेक्टेयर पोलावरम् 436804 हेक्टेयर। विद्युत उत्पादन में बोधघाट में 300 मेगावाट पोलावरम् में 1040 मेगावाट।
डूबान प्रभावित ग्राम में बोधघाट (प्रस्तावित) परियोजना से 42 और पोलावरम् परियोजना से 288 जिसमें छत्तीसगढ़ के 9 गांव प्रभावित है। विस्थापित होने वाले परिवारों की जनसंख्या 12,888 जबकि पोलावरम् परियोजना से 1 लाख 95,357 प्रभावित हुए हैं।
इन्द्रावती नदी कैचमेंट से छत्तीसगढ़ द्वारा पूर्ण योजनाओं में 11.091 टी.एम.सी. तथा निर्माणाधीन योजनाओं अन्तर्गत 1.932 टीएमसी कुल 13.023 टीएमसी जल उपयोग किया जा रहा है। बोधघाट परियोजना अन्तर्गत प्रस्तावित जल उपयोग की मात्रा 155.911 टीएमसी है। गोदावरी जल विवाद अभिकरण द्वारा आबंटित 300 टीएमसी (8496 मि.घ.मी.) जल के विरूद्ध छत्तीसगढ़ राज्य द्वारा बोधघाट परियोजना सहित केवल 168.934 टीएमसी (4784 मि.घ.मी.) जल का उपयोग प्रस्तावित है, अतः योजना निर्माण में कोई अंतर्राज्यीय मुद्दा नहीं है।

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