पाठ जात्रा

बस्तर की जो अंतराष्ट्रीय पहचान बनी है उसमें यहां के रीति रिवाजों और परम्पराओं का बहुत योगदान है। इसमें सबसे खास बात यह है कि यह 75 दिनों तक चलता है और इन पूरे 75 दिनों तक ट्राईबल कल्चर को नजदीक से देखा जा सकता है।
बस्तर दशहरे में कई रस्में निभाई जाती है और सबसे पहली रस्म होती है जिसे पाट जात्रा कहते है। इसी के साथ बस्तर दशहरे की विधिवत शुरूआत होती है । आईए समझने को कोशिश करते हैं क्या है पाट जात्रा ? किस प्रकार इसे मनाया जाता है?

पाठ जात्रा

पाटजात्रा या पाठ जात्रा यह जुलाई आखिरी दिनों में हिन्दु कलेण्डर के मुताबिक श्रावण महिने में मनाया जाता है। यह हरियाली अमावस्या में होता है और इसी दिन रथ निर्माण के लिए लकड़ी लाई जाती है जिसे ठुरूलू खोटला कहा जाता है। youtube  channel बस्तरिया बालीफूल (Bastariya Baliphul)  के मुताबिक ग्राम बिलोरी से साल वृक्ष का यह लठ्ठा लाया जाता है और दंतेश्वरी मंदिर के सामने पूरे विधि विधान के साथ इसकी पूजा की जाती है। साल वृक्ष की लकड़ी से ही विशालकाय रथ निर्माण किया जाता है।

 

जानिए !  कौन हैं रूद्र नारायण पानीग्राही

 

ठुरूल यानि ठोस

अंचल लेखक और इतिहासकार रूद्रनारायण पानीग्राही ने अपनी किताब बस्तर दशहरा (Bastar Dushahra)  में लिखते हैं कि ठुरूलू का अर्थ हल्बी लोक बोली में ऐसा तना जो ठोस एवं भरा हो । आगे वे लिखते हैं इस लकड़ी के टुकडे को स्थानीय दंतेश्वरी मंदिर के सामने रखा जाता है और रथ बनाने में उपयोग की जाने वाली औजारों के साथ पूजा अर्चना की जाती है। यही पूजा पाठ जात्रा कहलाता है। इस पूजा विधान में मांझी,मुखिया ,जनप्रतिनिध, विधायक, गणमान्य नागरिक अनिवार्य रूप से मौजूद रहते हैं , बस्तरिया बालीफूल के मुताबिक इसकी पूजा मोगरी मछली, अंडा और बकरे के साथ की जाती है और इसे वहीं छोड दिया जाता है। बस्तर इतिहास में रूद्रनारायण पानीग्राही लिखते हैं कि अंडा, मोगरी मछली और बकरे की बलि दी जाती है और बलि देने के तरपनी यानि मदिरा अर्पित की जाती है ।
वे आगे लिखते है कि पूजा विधान में पूजारी यह कामना करता है कि जिस उद्देष्य से यह लकड़ी लाई गई है वह बिना किसी रूकावट के हो यानि रथ निर्माण कार्य निर्विघ्न हो। पूजा अर्चना के बाद लकड़ी पर कील ठोकी जाती है । इसके पीछे लोक मान्यता यह है कि अन्य देवी देवताओं को पर्व के लिए आव्हान किया गया है और वे अन्यत्र कही न जाएं तथा पर्व बिना रूकावट संपन्न हो। यह प्रथा आज भी प्रचलित है।

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बस्तर दशहरा

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