सामुदायिक विकास कार्यक्रम 1952 इस उद्देश्य से प्रारंभ किया गया था कि लोगों को सरकार की स्थानीय गतिविधियों से जोड़ा जाए और उन्हें स्वशासन से परिचित कराया जाए लेकिन सामुदायिक विकास कार्यक्रम पूरी
तरह से असफल रहा।
इसके बाद पंचायती राज व्यवस्था को मजबूत करने के लिए जनवरी 1957 बलवंत राय मेहता की अध्यक्षता में ग्राम उद्धार समिति या Balwant rai mehta samiti का गठन किया गया ।
इस समिति ने अपनी रिपोर्ट नवंबर 1957 को प्रस्तुत की जिसमें जनतांत्रिक विकेंद्रीकरण योजना स्थापित करने की सिफारिश की गई इसके बाद इसे पंचायती राज कहा जाने लगा।
बलवंत राय मेहता समिति की सिफारिशें–:
इस समिति की प्रमुख सिफारिशें निम्नलिखित है।
i) तीन स्तरीय पंचायती राज प्रणाली की स्थापना ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत ब्लॉक स्तर पर पंचायत समिति और जिला स्तर पर जिला परिषद इन तीनों स्तरों को एक दूसरे के साथ जोड़े रखने के लिए अप्रत्यक्ष चुनाव
को माध्यम बनाया जाना चाहिए
ii) ग्राम पंचायतों का गठन प्रत्यक्ष रूप से चुने गए प्रतिनिधियों को शामिल करके किया जाना चाहिए जबकि पंचायत समिति और जिला परिषद का गठन अप्रत्यक्ष रूप से चुने गए प्रतिनिधियों को शामिल करके किया जाना चाहिए।
iii) इन निकायों को योजना और विकास से जुड़े सभी कार्यों सोपे जाने चाहिए।
iv) पंचायत समिति को कार्यकारी निकाय तथा जिला परिषद को परामर्शी समन्वयक और पर्यवेक्षक निकाय बनाया जाना चाहिए।
v) जिलाधीश को जिला परिषद का अध्यक्ष बनाया जाना चाहिए।
vi) ग्रामीण पंचायती जनतांत्रिक निकायों को आवश्यक शक्तियां और जिम्मेदारी सौंपी जानी चाहिए।
vii) इन कार्यों और जिम्मेदारियों के निर्वहन के लिए इन निकायों को पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
viii) ऐसे उपाय किए जाने चाहिए जिनसे इन संस्थाओं को भविष्य में और अधिक अधिकार और जिम्मेदारियां मिल पाए।
बलवंत राय मेहता समिति की सिफारिशें राष्ट्रीय विकास परिषद द्वारा जनवरी 1958 में स्वीकार कर ली गई, परिषद ने एक अकेले पैटर्न के आधार पर पंचायतों के गठन के बजाय उनके निर्धारण का अधिकार स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार करने का कार्य राज्यों पर छोड़ दिया।
साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया कि मूल सिद्धांत और व्यापक आधार पूरे देश में एक समान ही रहेंगे।
बलवंत राय मेहता समिति के सुझाव के आधार पर सबसे पहले पंचायती राज प्रणाली का गठन राजस्थान राज्य में किया गया, तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 2 अक्टूबर 1959 को नागौर जिले में पंचायती राज व्यवस्था का उद्घाटन किया था।
उसके बाद आंध्रप्रदेश में यह प्रणाली वर्ष 1959 में ही अपनाई गई और इसके बाद अधिकांश राज्यों ने भी इस प्रणाली को अपना लिया।
अधिकांश राज्यों ने पंचायती राज प्रणाली को वर्ष 1960 के मध्य तक अपना लिया किंतु, अलग-अलग राज्यों में पंचायत के स्तरों की संख्या समिति और परिषद की परस्पर स्थिति उनके कार्यकाल, संरचना कार्य तथा वित्तीय प्रबंधन आदि की दृष्टि से असमानता थी।
उदाहरण स्वरूप राजस्थान में तीन स्तरीय पंचायती राज प्रणाली अपनाई गई वहीं दूसरी ओर तमिलनाडु में दो स्तरीय पश्चिम बंगाल में चार स्तरीय प्रणाली अपनाई गई,
इसके अतिरिक्त राजस्थान, आंध्रप्रदेश पैटर्न में पंचायत समिति शक्तिशाली थी, क्योंकि ब्लॉक ही नियोजन और विकास कार्य से जुड़ी इकाई थी, महाराष्ट्र गुजरात पैटर्न में जिला परिषद शक्तिशाली थी क्योंकि नियोजन
और विकास कार्यों से जुड़ी इकाई जिले में स्थित थी, कुछ राज्यों ने छोटी-छोटी दीवानी और आपराधिक मामलों को निपटाने के लिए न्याय पंचायत भी गठित कर ली थी।
पंचायती राज व्यवस्था को लेकर बलवंत राय मेहता द्वारा दी गई महकती सिफारिशों के बावजूद पंचायती राज व्यवस्था असफल हो गई, उसका प्रमुख कारण राज्य सरकारों पर पंचायतों के गठन की किसी भी प्रकार की अनिवार्यता का नहीं होना प्रमुख कारण था।
शुरुआती गठन के बाद राज्य सरकारों ने पंचायतों के गठन में किसी भी प्रकार की ना तो दिलचस्पी दिखाई और ना ही उनके कार्य करने के लिए किसी भी प्रकार के वित्तीय साधनों का निर्माण किया।
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