malik kafur. x जेंडर सेनापति जिसने “कोहेनूर” हिरे को गुमनामी से बाहर निकाला |

मलिक-काफ़ूर

 समाज में हमेशा ही “X” जेंडर या थर्ड जेंडर के लोगों के साथ भेदभाव किया है , साथ ही उन्हें समाज पर बोझ के रूप में देखा है,और समाज ने उन्हें हमेशा ही बहिष्कृत किया है।

लेकिन इतिहास में कई ऐसे एक्स जेंडर हुए हैं जिन्होंने अपनी योग्यता और बुद्धिमानी से इतिहास में एक अलग स्थान बनाया है, बावजूद इसके कि उनके साथ हमेशा भेदभाव किया जाता रहा है, जो आज भी बदस्तूर जारी है।

एक्स जेंडर की पहचान के साथ वोटिंग का अधिकार भी 2014 में ही इन्हें प्राप्त हुआ है |

          इस लेख में ऐसे सेनानायक की चर्चा करेंगे जो “X” जेंडर था, लेकिन उसने अपनी योग्यता के बल पर संपूर्ण दक्षिण भारत में अपनी जीत का परचम लहराया था।

 उसका नाम malik kafur  या हजार दिनारी भी कहा जाता था,नाम की चर्चा आगे करेंगे यह एक गुलाम था सल्तनत कालीन सुल्तान अलाउद्दीन का सेनापति |

मलिक काफूर ( who was malik kafur):–

इतिहासकारों में इस बात को लेकर एकमत नहीं है कि, malik kafur हिंदू धर्म का था या मुस्लिम  कुछ इतिहास कार उसे हिंदू धर्म का जबकि कुछ उसे मुस्लिम धर्म का बताते हैं, पर वह निश्चित रूप से X जेंडर था।

 जिसे गुजरात अभियान के दौरान अलाउद्दीन खिलजी के एक अन्य सेनापति नुसरत खान ने इसवी 1298 में 1 हजार दिनार में खरीदा था, उसने इसे खरीद कर अलाउद्दीन खिलजी के सामने पेश किया।

जहां malik kafur उर्फ हजार दिनारी ने अलाउद्दीन की सेवा की और उसका करीबी बन गया | 1307 में सुल्तान ने उसे दिल्ली  का मलिक नवाब बना दिया।

इसके बाद सेनापति के रूप में उसने खिलजी सेना का नेतृत्व किया, और देवगिरी, वारंगल, द्समुद्र, मालाबार और मदुरई को जीतकर सुदूर दक्षिण तक खिलजी साम्राज्य का फैलाव कर दिया |

मालिक कफूर की उपलब्धियां (alauddin khilji and malik kafur) :–  

अलाउद्दीन खिलजी के गुलाम मालिक कफूर की उपलब्धियां बहुत बड़ी थी, सेनापति के रूप में मालिक कफूर ने खिलजी सल्तनत को भारत के सुदूर दक्षिण छोर तक फैला दिया था।

उसके कुशल नेतृत्व में खिलजी सेना ने संपूर्ण दक्षिण भारत पर अपना अधिकार कर लिया था वह प्रमुख है राज्य  जिस पर खिलजी सेना ने अधिकार किया वह निम्न है |

देवगिरी :–         देवगिरी राज वर्तमान महाराष्ट्र के भूभाग वाले हिस्से में स्थित था 1307– 8 में राजा राम चंद्र देवगिरी का राजा था, मलिक काफूर की खिलजी सेना ने देवगिरी पर आक्रमण करके जमकर लूटपाट मचाया और राजा रामचंद्र को बंदी बना लिया गया ।

मलिक काफूर ने उसे दिल्ली में सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के सामने पेश किया और इस प्रकार देवगिरी दिल्ली सल्तनत के अधीन हो गया ।

तेलंगाना :–             सन 1309 ईसवी में मालिक कफूर के नेतृत्व में तेलंगाना पर आक्रमण हुआ ,जिसकी राजधानी वारंगल थी, यह आक्रमण सफल रहा और राजा प्रताप रूद्र देव ने आत्मसमर्पण कर दिया ।

 मलिक काफूर के नेतृत्व में एक और दक्षिण भारतीय राज्य दिल्ली सल्तनत के अधीन हो गया |

              तेलंगाना के आक्रमण के साथ एक दिलचस्प किस्सा जुड़ा हुआ है, इतिहासकारों के अनुसार जब खिलजी सेना मलिक काफूर के नेतृत्व में वारंगल पहुंची, तब आत्मसमर्पण करने के लिए राजा रूद्र प्रताप देव ने

अपनी एक सोने की मूर्ति बनवा कर मूर्ति के गले में एक सोने की जंजीर डालकर उसे मालिक कफूर को उपहार स्वरूप दिया।

साथ ही 100 हाथी 900 घोड़े सोने चांदी और जवाहरात के ढेर भी उपहार के रूप में दी साथ ही वार्षिक कर देने का भी वादा किया और खिलजी की अधीनता स्वीकार कर ली |

होयसल :–             वर्तमान कर्नाटक के भूभाग में यह राज्य स्थित था जिसकी राजधानी द्वार समुद्र थी का राजा बीर बलाल तृतीय था, 1310 ईसवी में मालिक ने  होयसल पर आक्रमण किया।

बलाल ने ज्यादा प्रतिरोध न करते हुए आत्मसमर्पण कर दिया और खिलजी की अधीनता स्वीकार कर ली | 

पांडय :–           मालाबार वर्तमान केरल के हिस्से में पांडय शासकों का राज्य था, सुंदर पांडे और वीर पांडे के मध्य सत्ता को लेकर हुए संघर्ष में सुंदर पांडे पराजित हुआ, उसने मालिक कफूर से सत्ता प्राप्त करने के लिए मदद मांगी ।

1311 ईस्वी में खिलजी सेना ने पांडय राज्य की राजधानी वीरपुर पर आक्रमण किया इस आक्रमण से वीर पांडय नहीं पकड़ा गया और यह क्षेत्र सल्तनत के अधीन नहीं हो पाया, परंतु मलिक काफूर में कई मंदिरों

को तोड़ा अपार सोना चांदी धन दौलत लेकर वह वापस दिल्ली लौट आया |

       इस प्रकार खिलजी की सेना के इस एक्स जेंडर सेनापति ने दिल्ली सल्तनत का विस्तार सिंधु नदी से पूर्व में बंगाल तक और पश्चिम में गुजरात से लेकर दक्षिण में मदुरई तक फैला दिया।

यह उसके कुशल नेतृत्व का ही परिणाम था कि, खिलजी सेना दक्षिण भारतीय राज्यों में एक बार भी नहीं हारी और उसने लगभग सभी दक्षिण भारतीय राज्यों को खिलजी सल्तनत के अधीन कर दिया।

इतिहासकारों के अनुसार मलिक काफूर अलाउद्दीन खिलजी का सच्चा गुलाम था, युद्ध में जीते गए सारे धन दौलत वह अलाउद्दीन खिलजी के सुपुर्द कर देता था | 

 

मालिक कफूर का पतन  (who killed malik kafur):–             

अलाउद्दीन खिलजी के जीवित रहते तक मलिक काफूर उसका वफादार बना रहा, लेकिन 1316 ईस्वी में अलाउद्दीन की मृत्यु के बाद उसने उसके कम उम्र पुत्र शहाबुद्दीन को उत्तराधिकारी बना कर मलिक काफूर ने सारी शक्तियां खुद हथिया ली ।

सत्ता के लालच में उसने अलाउद्दीन के दो पुत्रों की आंखें भी निकलवा ली और उनकी मां को बंदी बना लिया ।

अलाउद्दीन के तीसरे पुत्र मुबारक खिलजी ने अलाउद्दीन के वफादार  के सहयोग से 35 दिन बाद ही malik kafur की हत्या करवा दी, और इस प्रकार एक योग्य सेनापति जिसने खिलजी सल्तनत का अभूतपूर्व विस्तार किया था का अंत हो गया |

कोहिनूर हीरा और मलिक काफूर  :–  

दुनिया के सबसे शापित वस्तुओं में शुमार कोहिनूर हीरे का भी संबंध मलिक काफूर से है, इतिहासकारों के अनुसार 1310 में हुए वारंगल आक्रमण के समय तेलंगाना के राजा प्रताप रूद्र देव ने उपहार स्वरूप यह हीरा मलिक काफूर को दिया था, जिसे उसने  अलाउद्दीन खिलजी को सौंप दिया था |

ऐसा माना जाता है यह हीरा  वारंगल राज्य के गुंटूर जिले में स्थित गोलकुंडा की खदानों से निकाला गया था।

हीरे के अभिशप्त होने की बहुत सारी कहानियां बनाई गई है, लेकिन यदि ऐतिहासिक रूप से इस हीरे के स्वामियों के ऊपर नजर डालें तो इस तथ्य की पुष्टि होती है, कि यह कोहिनूर हीरा जिसके पास भी गया उसका दुर्भाग्य प्रारंभ हो गया ।

                       ऐतिहासिक रूप से पुष्ट प्रमाणों के आधार पर यह हीरा वारंगल के राजा रुद्र प्रताप देव से मालिक कफूर के द्वारा अलाउद्दीन खिलजी तक पहुंचा।

कुछ वर्षों के बाद ही अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु हो गई और दिल्ली सल्तनत पर तुगलक ने अपनी सत्ता स्थापित कर ली ।

               इसके बाद यह हीरा मोहम्मद बिन तुगलक के पास पहुंचा सल्तनत काल का सबसे योग्य, इस शासक को भाग्य का साथ कभी भी नहीं मिला,इसे पागल भी करार दे दिया गया ।

इस प्रकार इसे हीरे का श्राप कहें या तुगलक की बदकिस्मती की सारा जीवन वह सुकून से कभी भी शासन नहीं कर पाया ।

                       इसके बाद यह हीरा मुगलों के पास पहुंचा जहां यह तख्ते ताऊस (मयूर सिंहासन ) मैं जड़ा गया था ,मुगल बादशाह मोहम्मद शाह के समय नादिरशाह ने 1739 ईस्वी में दिल्ली पर आक्रमण किया और इस सिंहासन को उठा ले गया और इस तरह यह हीरा नादिरशाह के पास पहुंच गया।

ऐसा माना जाता है कि इस हीरे का नामकरण कोहिनूर (रोशनी का पहाड़ ) नादिर शाह ने ही किया था और यहीं से नादिरशाह का भी दुर्भाग्य इस हीरे से जुड़ गया कुछ वर्षो के अंदर ही उसकी हत्या हो गई, और यह हीरा अफगानी शासक अहमद शाह दुर्रानी के पास पहुंच गया |

                    1813 ईस्वी में महाराजा रणजीत सिंह ने यह हीरा अहमद शाह दुर्रानी से हासिल किया, और यहीं से महाराजा रणजीत सिंह का भी दुर्भाग्य प्रारंभ हो गया धीरे-धीरे उनका सारा राज्य बिखर  गया  और उनकी मृत्यु भी हो गई  ।

                इसके बाद यह हीरा ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथ लगा वर्तमान में यह हीरा महारानी एलिजाबेथ द्वितीय के ताज में जड़ा हुआ है ।

वर्तमान में यह हीरा 105 कैरेट का है जो पहले 300 कैरेट से भी ज्यादा का था इस प्रकार काकतीय वंश से मलिक कपूर से होते हुए यह हीरा इंग्लैंड की महारानी तक पहुंचा और जिसके पास भी रहा उसकी जान माल के लिए यह हीरा हानिकारक ही साबित हुआ ।

जानिए अल्लाउद्दीन खिलजी और उसके बाज़ार नियंत्रण के बारे मे, 

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  1. अलाउद्दीन खिलजी | श्रापित हीरा "कोहेनूर" खिलजी के पास कैसे पहुचा ? - News Next February 9, 2023 at 14:27

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