बस्तर दशहरा

बस्तर में दशहरे का इतिहास 612 वर्ष पुराना है। आस्था और परस्पर सहायोग का प्रतीक बस्तर दशहरे की शुरूआत 1408 में काकतीय महाराजा पुरषोत्तम देव ने की थी । इसमें खास बात यह है कि यह त्यौहार राम की रावण पर विजय के प्रतीक के रूप में नहीं मनाई जाती है। तो फिर क्यों मनाई जाती है यह त्यौहार ? क्या खास बातें होती हैं इसमें ? जानने के लिए अंत तक पढ़िए।

महत्वपूर्ण बात
बस्तर दशहरे को लेकर कई ऐसी जानकारियां है जो हर बस्तरवासी और बस्तर के बारे में जानकारी रखने वाले लोगों को जानना आवश्यक है। जानते हैं वे क्या हैं?
पहला तो यह कि
यह त्यौहार पूरे 75 दिनों तक चलता है।
इसमें राम और रावण की लड़ाई का कोई जिक्र नहीं होता है
बस्तर की देवी दंतेश्वरी को समर्पित है । दंतेश्वरी देवी दुर्गा का ही रूप जिसकी पूजा अर्चना की जाती है।
बस्तर दशहरे के कारण छत्तीसगढ़ को अंतराष्ट्रीय पहचान मिली । त्यौहार के विदशों से लोग बस्तर आते है। और दशहरे के साथ-साथ यहाँ मौजूद पर्यटनों स्थलों पर भी लोग बड़ी संख्या में पहुचते है। 2020 में कोरोना महामारी के चलते बस्तर दशहरे का आर्कषण कुछ फीका था।
मगर वे सारे विधान किए गए जो 612 वर्षों से चले आ रहें हैं। जानते है इस त्यौहार में विधान क्या है ? और किस प्रकार इसे निभाए जाते हैं? बस्तर दशहरा की अद्भुत रस्मों के लिए पूरे विश्व में इसकी पहचान है।
बस्तर दशहरे में की जाने वाली पूजा विधान और रस्में
बस्तर में दशहरे के दौरान निभाई जाने वाली पूजा विधान और रस्मों का बड़ा महत्व है। इसमें सबसे पहली रस्म होती है जिसे पाट जात्रा कहते हैं

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1. पाट जात्रा

दशहरे की शुरूआत जुलाई के महिने से ही शुरू हो जाती है जब हरेली अमावस्या आती है तो पहली रस्म निभाई जाती है जिसमें राज परिवार के सदस्य, मांझी-मुखिया, मेम्बर, मेम्बरीन, चालकी और दशहरा समिति प्रशासनिक अधिकारी, जनप्रतिनिधि इत्यादि मौजूद रहते हैं। यह रस्म स्थानीय दंतश्वरी मंदिर के सामने होता है।
इस रस्म के तहत उस लकड़ी की पूजा की जाती है जिससे विषालकाय रथ का निर्माण किया जाता है। परम्परा के तहत ग्राम बिलौरी से लकड़ी लाई जाती है और सभी लोगों की मौजूदगी में मांगूर मछली, बकरे की बलि देकर इस विधान को विधि पूर्वक पूजा अर्चना की जाति है।
फिर मंदिर में पूजा अर्चना की जाती है

2.डेरी गढ़ाई

इसके बाद एक महिने के अंतराल में डेरी गड़ाई की रस्म होती है। जो सिरहासार भवन में होती है इस रस्म के अनुसार सिरहासार में लकड़ी के खम्बे की स्थापना की जाती है जो दस फीट ऊँची होती है। इस लकड़ी पर बकायदा हल्दी का लेप लगाया जाता है और इसकी पूजा-अर्चना की जाती है । इस अवसर पर पुजारी, दशहरा से जुड़े पदाधिकारी जिन्हें चालकी, मेम्बर -मेम्बरीन कहते है मौजूद रहते हैं । महिलाएं इस अवसर पर हल्दी आदि एक दूसरे को लगाकर खुशियां मनाती है । इस पूजा में मागूर मछली यानि मोंगरी मछली की बलि भी दी जाती है जो इस परम्परा का अहम हिस्सा होता है। और इस पूजा के बाद ही विशालकाय रथ निर्माण का काम होता है जिसमें 200 से ज्यादा कारीगर लगातार काम करते हैं और पारम्परिक औजारों के साथ रथ का निर्माण करते हैं। डेरी गढ़ाई की रस्म का उद्येश्य यह है कि रथ निर्माण में किसी भी तरह का कोई विध्न न आए।

3.काछिन गादी विधान

फिर लगभग एक महिने के अंतराल के बाद एक महत्वपूर्ण रस्म किया जाता है जिसे काछिन गादी विधान कहते हैं। इस विधान के तहत मिरगान अथवा पनका जाति की कुंवारी कन्या एक बेल के कांटे के झूले में बैठकर राजपरिवार के सदस्य को दशहरा शुरू करने की अनुमति देती है। और फिर जोगी बिठाई रस्म के साथ शुरू होता है बस्तर का दशहरा और विशालकाय रथ का निर्माण तब तक हो चुका होता है तो उसे पूरे छ दिनों तक जगन्नाथ मंदिर के चारों तरफ घुमाया जाता है ।  थोड़ा और जानते हैं काछिन गादी रस्म के बारे में काछिन देवी कुल देवी होती है मिरगान अथवा पनका जाति की गादी का अर्थ होता है मंदिर। बस्तर के पूर्व महाराजा 1772 ई में इस रस्म की शुरूआत की थी और उस समय से लेकर आज तक यह रस्म निभाई जा रही है। बिना काछिनदेवी की अनुमति के बिना दशहरा आरम्भ नहीं होता है। यह रस्म कछिन गुड़ी या मंदिर में निभाया जाता है जो जगदलपुर के पथरागुड़ा में स्थित है।
इसके बाद होता है जोगी बिठाई

3.जोगी बिठाई

इसे जगदलपुर के सिरहासार भवन में निभाई जाती है। हल्बा जाति का एक व्यक्ति काछिन देवी से दशहरे की अनुमति मिलने के बाद नौ दिनों तक निराहार एक छोटे से गड्डे में उपवास-साधना में बैठता है इस उम्मीद के साथ की दशहरे की आने वाली पूरी रस्में निर्विन्घ्न चलती रहे। वह नौ दिनों तक अपनी उपवास साधना करता रहता है। और नौ दिनों के बाद जब वह अपनी साधना तोड़ता है तो उसे जोगी उठाई कहते हैं।  कलश स्थापना जोगी बिठाई के साथ ही सभी मंदिरों में कलशों की स्थापना की जाती है । जिनमें दंतेश्वरी मंदिर, मावली मंदिर,विष्णु मंदिर, माता मंदिर इत्यादि । लोग अपनी अपनी मान्यताओं के अनुसार इन मंदिरों में कलश स्थापना की जाती है। जोगी बिठाई के दूसरे दिन नौ रात्र की भी शुरूआत हो जाती है और शरू होता है फूल रथ की परिक्रमा ।

फूलरथ परिक्रमा

विशालकाय रथ को फूलों से सजाया जाता है और छ दिनों तक उसे जगन्नाथ मंदिर से गोलबाजार होते हुए गुरूनानक चैक से दंतेश्वरी मंदिर लाया जाता है जिसे फूल रथ परिक्रमा कहते हैं । प्रत्येक दिन रथ में दंतेश्वरी के छत्र को एक परम्परानुसार पूजा विधान से रखा जाता है और साथ में पुजारी, और अन्य सेवादार लगे होते है। जगन्नाथ मंदिर से पूजा विधान कर इसे एक परिक्रमा की जाती है। विशालकाय रथ को रस्से से ग्रामीण खींचते हैं । यह नजारा बहुत खूबसूरत लगता है। प्रत्येक दिन महिलाएं चाँवल इत्यादि से रथ की नजर उतारती है । रथ के ऊपर सेवादार और पुजारी इत्यादि रहते हैं।  रथ परिक्रमा पूर्ण होने के एक दिन पूर्व ही एक विधान होता है जिसे बेल पूजा कहते है

बेल पूजा

इस विधान में सरगीपाल से बेल फल के जोड़ों की पूजा की जाती है और यहाँ एक मेले जैसा माहौल होता है । बेल को ग्रामीण देवी दुर्गा का एक रूप मानते हैं । इस विधान के तहत पुजारी राजपरिवार के सदस्य और जनप्रतिनिधि सरगीपाल जाकर पूजा विधान में भाग लेते हैं । अश्विन शुक्ल पक्ष सप्तमी को यह विधान किया जाता है। इस विधान को ग्रामीण पुत्री विवाह की तरह मानते हैं और पूजा विधान के दौरान जम कर हल्दी खेलते हैं ।  किवदंती के अनुसार एक बार राजा अपने रियासत के गांव सरगीपाल में शिकार के लिए गए और वहाँ पेड़ के नीचे सुंदर कन्याओं को देखकर विवाह का प्रस्ताव रखा । कन्याओं ने अगले दिन बारात लेकर आने को कह तो राजा दूसरे दिन बारात लेकर पहुँच गए । कन्याओं ने अपना परिचय दंतेश्वरी और मणिकेश्वरी देवी के रूप में दिया तो राजा को अपनी भूल का अहसास हुआ और वे शर्मिंदा हुए । और देवियों को बस्तर दशहरा में शामिल होने का निमंत्रण दिया । तब से आज तक यह बेलपूजा विधान के नाम से जाना जाता है। इसे कन्या के विवाह के तौर पर लिया जाता है।

दूसरी किवदंती के अनुसार शिकार के दौरान राजा अपना छत्र भूल गए तो बेल देवी ने उन्हें छत्र के लिए बुलाया । और राजा ने उन्हें दशहरे में शामिल होने का निमंत्रण दिया।

महाअष्टिमी निशा जात्रा विधान

यह तांत्रिक विधान है जो रात के आरम्भ होता है । यह विधान माता खेमश्वरी के मंदिर में किया जाता है जो साल में सिर्फ एक बार ही खुलता है । यह मंदिर जगदलपुर में अनुपमा चैक पर स्थित है। राज परिवार, जनप्रतिनिध और अधिकारियों की मौजूदगी में अश्विन शुक्ल अश्टिमी की रात को इस विधान के तहत 12 बकरों की बलि दी जाती है । इस विधान में भैरवर की पूजा के बाद बलि देने की प्रथा है। सात डंडियों में भोजन तैयार किया जाता है। 24 हंडियों में उड़द दाल, चाँवल खीर और उड़द के बने बड़े बनाकर उन्हें रखा जाता है । तैयार भोजन को 24 हंडियों में रखने के बाद उनके मुँह बंद कर दिये जाते हैं। इसे बाद में मावली मंदिर पहुँचा दिया जाता है। और फिर पूजा के बाद प्रसाद को गायों को खिलाकर हंडियों को तोड़ दिया जाता है। हंडयों में भोजन तैयार करने की जिम्मा यादव समाज को होता है ।

जोगी उठाई ,कुँवारी पूजा विधान तथा मावली परघाव

पहले जोगी उठाई की बात करते हैं । नौ दिनों तक निराहार रहने के उपरान्त जोगी उठाई की परम्परा है । यानि जोगी जो दशहरा के र्निविन्ध्न सम्पन्न कराने के उद्देष्य से बैठा हुआ होता है वह अब अपने उपवास को इस दिन तोड़ता है जिसे जोगी उठाई कहते हैं । दुर्गा के नौ रूपों के प्रतीक कुँवारी कन्याओं की पूजा की जाती है जिसे कुँवारी पूजा विधान कहते हैं और रात में होता है- मावली परघाव

मावली परघाव

इस रस्म को समझने के लिए पहले समझना होगा मावली परघाव का क्या अर्थ है। परघाव यानि स्वागत, मावली कर्नाटक के माल्वल्य गाँव की कुल देवी थी । यानि इस रस्म का अर्थ हुआ देवी मावली का स्वागत। जब तक बस्तर में नागवंशीयों का शासन था तब तक मावली देवी की पूजा होती रही जो नौवमी से चैदहवीं सदी तक चलती रही । चालुक्यों के शासन के दौरान दशहरे में मावली देवी की पूजा करने का विधान राजा अन्नमदेव ने शुरू किया ।
तब से लेकर आज तक प्रतिवर्ष दशहरे में मावली देवी का पूरे सम्मान के साथ स्वागत किया जाता है। उनके सम्मान में जमकर आतिशबाजियां होती है। यह कार्यक्रम विजयी दशमी के दिन होता है। इस दिन मावली देवी के साथ कई देवी देवता बस्तर आते है और दशहरे में शिरकत करते हैं। इसी रस्म को मावली परघाव कहते हैं।
इसी के साथ 8 चक्के के विशाल रथ का परिचाल किया जाता है। कहते हैं महाराजा पुरूषोत्तम देव को जब रथपति की उपाधि मिली थी तो 12 चक्कों रथ परिक्रमा हुआ करता था। बाद में रथ 4 और 8 चक्कों वाला दो रथ बनाया गया ।  विजयादषमी के दिन होता है मावली परघाव ।

भीतर रैनी और रथ परिक्रमा विधान

इसके बाद होता आठ चक्कों के रथ का परिचालन किया जाता है जो सिरहासार से दंतश्वरी मंदिर और फिर रात में ही लाल बाग स्थित कुम्हाडाकोट पर ले जाया जाता है। जिसमें 55 गांवों के लोग जुड़ते हैं। जिसमें आंगा देव सहित 486 देवती देवता रथ पर होते हैं।
इसके पीछे एक किवदंती यह है कि महाराजा माड़िया समुदाय को किसी भूलवश दशहरे का आमंत्रण नहीं दे पाए जिससे माड़िया समुदाय कुछ क्षुब्ध हो गया और दशहरे के वक्त 11 दिन रथ रात को चुरा कर ले गया और उसे कुम्हड़कोट के जंगल में छुपा दिया । और राजा को खबर की अगर आप हमारे साथ एक दिन भोजन ग्रहण करें तो हम आपको रथ लौटा देंगे। महाराजा ने उनकी बात मानी और कुम्हाड़ा कोट गए। उनके साथ भोजन ग्रहण किया । यहीं नए फसल आने पर एक त्यौहार मनाया गया जिसे नया खानी कहते है।

बाहर रैनी

यह विधान लालबाग स्थित कुम्हड़ा कोट में किया जाता है। जिसे बाहर रैनी कहते है। इस रस्म के तहत कुम्हाड़ा कोट में स्थित रथ को बाजे गाजे के साथ समारोह पूर्वक वापस जगदलपुर दंतेश्वरी मंदिर तक लाया जाता है। इसके बाद शाम को विशाल 8 चक्कों के रथ का परिचालन किया जाता है। बड़ी संख्या में इसे लोग प्रतिवर्ष देखने आते हैं।

काछन जात्रा विधान और मुरिया दरबार

काछन जात्रा यह एक धार्मिक अनुष्ठान है। इसमें काछन देवी की पूजा की जाती है।
यह बस्तर दशहरे का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है जिसमें बस्तर संभाग के राज्य स्तर के मंत्री, सांसद, पुजारी सभी प्रशासनिक अधिकारी, पुजारी, बस्तर रियासत के सदस्य, चालकी मेम्बर मेम्बरीन, दशहारा कमेटी से जुड़े सभी लोग और आमंत्रित अतिथिगण एक साथ सीरहासार भवन में एक बैठक करते हैं जिसे मुरिया दरबार कहते हैं । राजतंत्र के दौरान राजा बैठकर समस्याओं का निराकरण करते थे। अब व्यवस्था नेता व प्रशासनिक अधिकारी बैठकर जनता की विभिन्न समस्याओं का निराकरण करते हैं। इस बैठक में हिस्सा लेना सभी के लिए अनिवार्य होता है।

कुटुम्ब जात्रा

यह विधान स्थानीय गंगामुडा तालाब के समीप किया जाता है ।यह एक धार्मिक अनुष्ठान है। इस विधान के तहत बस्तर आए सभी देवी-देवताओं की विदाई के लिए और उनके सम्मान में पूजा पाठ की रस्में की जाती है। यह गीदम रोड स्थित महात्मागांधी स्कूल में की जाती है।

मावली माता और दंतश्वरी देवी की विदाई

इसके बाद मावली माता और दंतेवाड़ा से आई देवी दंतश्वरी को एक समारोह पूर्वक ससम्मान विदा किया जाता है। मान्यता है वे बस्तर दशहरा में शामिल होने आई थी और दशहरा की समाप्ति के बाद वे वापस दंतेवाड़ा चली जाती है। इतना ही नहीं दशहरा में बस्तर संभाग में मौजूद 250 देवी देवता आते हैं । उन्हें भी ससम्मान विदा किया जाता है ।  इस तरह बस्तर दशहरा का समापन होता है। बस्तर दशहरा अपने आप में कई खूबियां समेटे हुए है। इसे देखने प्रतिवर्ष लोग दूर-दूर से यहाँ आते हैं । पूरे सम्भाग में एक उत्सव का माहौल होता है।

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