Maharaj Pravir Chand Bhanj Dev

बस्तर के इतिहास के बारे में बहुत सारी जानकारी तत्कालीन महाराजा प्रवीरचंद्र भंजदेव की लिखी पुस्तकें बताती हैं । जिनमें लोहंडीगुड़ा तरंगिनी जो 104 पृष्ठ का है तथा एक अन्य किताब आई प्रवीर दी आदिवासी गाॅड है । 200 पृष्ठों की लिखी ये पुस्तकें प्रवीर चंद्र भंजदेव के राजनीतिक विचारों को दर्शाती है।
महाराजा के प्रति आदिवासियों का प्रेम इतना अटूट था कि सरकारी नीतियां भी रोक नहीं सकी ।

1961 में मनाए जाने वाले दशहरे में वे राजपद पर नहीं थे और शासन से प्राप्त राशि महाराजा बने उनके अनुज विजयचंद्र को मिलना था मगर बस्तर में आदिवासी प्रवीर को ही राजा मानकर आपस में मिलकर दशहरे का खर्च उठाने को तैयार हो गए । और 1961 से लेकर 1965 तक का दशहरा आदिवासियों के अपने खर्च पर मनाया गया और शानदार मनाया जाता रहा ।आखिर प्रवीर चंद्र भंजदेव की किन खूबियों की वजह से वे आदिवासियों के मसीहा बने ? क्यों आदिवासी उन्हें अपना भगवान कहते थे? ये अक्सर जहन में आता है।
बस्तर के इतिहास के पन्नों को उलटने पर जो तथ्य सामने आएं है उसी के मुताबिक ये समझ आता है कि वे हमेशा आदिवासियों के हितों के लिए पूरी जिदगी लड़ते रहे । आदिवासियों के समाजिक और आर्थिक विकास के लिए वे हमेशा तत्पर रहते थे

1955 में उन्होने एक संघ का गठन किया जिसका नाम था बस्तर जिला आदिवासी किसान-मजदूर सेवा संघ जो बस्तर जिले में रहने वाले आदिवासियों के सामाजिक और आर्थिक विकास को लेकर सरकार तक अपनी बात कहता रहा।

अपने इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए वे 1957 में बस्तर जिला कांग्रेस के अध्यक्ष बने थे और मध्यप्रदेष विधान सभा में बस्तर का प्रतिनिधित्व भी किया था । मगर राजनीतिक उथल पुथल के चलते विधान सभा की सदस्यता से दो सालों के अन्दर ही त्यागपत्र दे दिया और प्रत्यक्ष रूप से बस्तर की सेवा करते रहे।
12 जनवरी 1965 को प्रवीर चंद्र भंजदेव बस्तर की समस्याओं के निराकरण पर कोई सुनवाई नहीं होने के कारण दिल्ली जाकर अनशन पर बैठ गए। और गृहमंत्री गुलजारी लाल नंदा के आश्वासन के बार ही उन्होंने अनशन समाप्त किया। इस बीच बस्तर जिलाधीश से आदिवासियों की समस्याओं के लिए निरंतर जवाब तलब करते रहे। और अपनी बात मनवाते रहे।

वे जानते थे प्रजातंत्र का अर्थ है जनता का षासन जनता के लिए और जनता द्वारा । अगर जनता खुश नही कोई मतलब नहीं।

जन्म प्रारम्भिक जीवन

प्रवीरचंद्र भंजदेव का जन्म 25 जून 1929 को शिलांग में हुआ । उनकी माता प्रफुल्लकुमारी देवी बस्तर की महारानी थी । वे चालुक्य (काकतीय) वंष की थी । जब महारानी का एपेंडीसाईटिस Operation के दौरान निधन हुआ तो ब्रिटिश सरकार ने प्रवीरचंद्र भंजदेव को बस्तर का महाराजा घोषित कर दिया उनके पिता मयूरभंज महाराज के भतीजे थे । ब्रिटिश कानून के अंतर्गत उन्हें बस्तर से निष्काषित कर दिया गया था । उनके बच्चों पर भी उनका अधिकार नहीं था। बालक प्रवीर का लालन पालन पश्चिमी ढंग से हुआ था। उनके लिए ब्रिटिष गार्जियन और नर्सें तैनात की गई थी जिससे वे मानसिक रूप से पूरी तरह बस्तर से हट जाएं और सदैव बस्तर अग्रेजों का बना रहे । मगर नीति को कुछ और ही मंजूर था। महाराजा सदैव बस्तर के हित में कार्य करते रहे।
भारत के आजाद होते ही बस्तर रियासत पूर्णतः भारतीय संघ में मिल गया। उस वक्त प्रवीर 18 वर्ष के थे।
13 जून 1953 को Court of Wards के अंतर्गत उनकी सारी संपत्ति ले ली गई और फिर 30 जुलाई 1963 को वापस कर दी गई थी।  1956 में प्रवीर को राजयक्ष्मा मरीज और पागल घोषित कर इलाज के लिए स्वीट्जरलैण्ड भेजा गया था। तीन माह के अंदर वहाँ के सेनोटेरियम ने उन्हें पूर्ण स्वस्थ्य घोषित कर दिया और वापस भेज दिया। लौटकर वे बस्तर जिला कांग्रेस के अध्यक्ष बने और चुनाव जीतकर विधायक भी बने । इस्तीफा भी दे दिया।
आदिवासियों ने उनकी गिरफ्तारी का विरोध किया तो लोहण्डी गुड़ा में भंयकर गोलीकाण्ड हुआ। उनकी गिरफ्तारी की पैरवी उन्होंने खुद जेल से की और 26 अप्रेल 1961 में जेल से रिहा हुए।
4 जुलाई 1961 को उनका विवाह राजस्थान पाटन की राजकन्या के साथ दिल्ली में हुआ। इसी वर्ष दशहरा का विवाद हुआ था जिसमें बस्तर के आदिवासियों ने प्रत्यक्ष रूप से प्रवीर चंद्र भंजदेव के अलावा किसी और को राजा मानने से इंकार कर दिया था।
बस्तर में 1950 में हुए साहित्य समेल्लन में मध्य प्रदेश के तत्काली मुख्मंत्री द्वारिका प्रसाद मिश्र मौजूद रहे। उस वक्त छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश एक ही थे । प्रवीर विद्या के पोषक थे । वे विद्वानों का सम्मान करते थे। धार्मिक ग्रंथों का उन्हें बड़ा ज्ञान था। 25 मार्च 1966 में बस्तर में हुए एक गोलीकांड में उनकी मृत्यु हो गई । मृत्यु के समय वे राजमहल थे। उनकी मौत को लेकर एक जांच आयोग अवश्य बैठा पर उसकी जांच अभी तक पूरी नहीं हुई।

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