Dholavira. हड़प्पा सभ्यता के पूरा स्थलों में एक नवीन कड़ी ।

हड़प्पा सभ्यता में प्रारंभिक खोजों में इसे एक सीमित क्षेत्र की ही सभ्यता माना गया था और इसे सिंधु घाटी सभ्यता कहा गया परंतु बाद में और विस्तृत खोजों के परिणाम स्वरूप और कई नए स्थलों की खोज हुई जिनका विकास सिंधु घाटी या हड़प्पा सभ्यता के बाद भी हुआ था।

इन्हीं में से एक प्रमुख स्थल Dholavira भी है। इस स्थल को हड़प्पा सभ्यता के पूरा स्थलों में एक नवीन कड़ी के रूप में देखा जाता है। Dholavira हड़प्पा सभ्यता का ही भाग है जो इस सभ्यता के बाद क्रमिक रूप से विकसित हुई।

Dholavira  स्थिति :–

धोलावीरा कांस्य युगीन सभ्यता गुजरात के कच्छ के रण के मध्य स्थित द्वीप खड़ीर में स्थित है इस द्वीप के समीप सुर्खाब शहर स्थित है धोलावीरा गांव खड़ीर द्वीप के उत्तर पश्चिम किनारे पर बसा है Dholavira पूरा स्थल की खुदाई से मिले अवशेषों का प्रसार मनहर एवं मानसर नामक नालों के बीच में हुआ है।

Dholavira नगर रचना :–

Dholavira के इस हड़प्पा संस्कृति वाले नगर की योजना समानांतर चतुर्भुज के रूप में की गई थी। इस नगर की लंबाई पूर्व से पश्चिम की ओर है नगर के चारों तरफ एक मजबूत दीवार के निर्माण के साक्ष्य मिले हैं नगर के महाप्रसाद वाले भाग के उत्तर में एक विस्तृत एवं व्यापक समतल मैदान के अवशेष मिले हैं।

इसके उत्तर में नगर का मध्यम भाग है जिसे पूर् की संज्ञा दी गई थी इसके पूर्व में नगर का तीसरा महत्वपूर्ण भाग है जिसे निचला शहर या फिर अवम नगर कहा जाता था।

Dholavira सभ्यता के सांस्कृतिक चरण :–

Dholavira की सांस्कृतिक यात्रा अनेक अवस्थाओं से गुजरती हुई एक दूसरे से अभिन्न रूप से जुड़ी हुई थी ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि धोलावीरा सभ्यता की यात्रा करीब 1000 वर्षों की रही होगी।

सांस्कृतिक अवस्थाओं या चरणों को 7 हिस्से में बांटा गया है।

प्रथम चरण

Dholavira सभ्यता का प्रथम चरण की इस बात का उद्घोष करता है कि यहां बसने वाले लोग एक पूर्ण और विकसित सभ्यता के थे पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर ऐसा अनुमान है कि यहां बसने वाले लोग संभवत सिंध और बलूचिस्तान से आए थे।

सभ्यता के प्रथम चरण के निवासी मिट्टी के बर्तन बनाने तांबा गलाने पत्थर तराशने उपरत्न सेलखड़ी शंख आदि के मनके के निर्माण की विधि में सिद्धहस्त थे। भवन निर्माण के कार्यों में इस सभ्यता के लोगों ने निश्चित मापो के सांचो में ढली मिट्टी की ईंटों का प्रयोग किया था।

ईटों के साथ-साथ सीमित मात्रा में पत्थरों के उपयोग के भी साक्ष्य मिलते हैं । आयताकार में निर्मित यहां की बस्तियों के चारों ओर 11 मीटर मोटी ईटों की दीवार निर्मित थी।

द्वितीय चरण 

सभ्यता के इस चरण में दुर्ग की बाहरी दीवार को अंदर की ओर 3 मीटर और चौड़ा कर दिया गया था प्राचीर का निर्माण कच्ची ईटों से हुआ प्रतीत होता है दीवार के अंदर वाले भाग में सफेद गुलाबी गहरा रंग की मिट्टी की

लगभग 13 परतों का लेप चढ़ाया गया था ऐसी ही मिट्टी का प्रयोग भवन के अंदर और बाहर की दीवारों पर प्लास्टर के लिए किया गया था।

तृतीय चरण

Dholavira सभ्यता के तीसरे चरण में भी दुर्ग की दीवार को और मजबूती प्रदान की गई और उसकी चौड़ाई 4 मीटर से भी अधिक बढ़ाई गई इस चरण में विकसित हड़प्पा नगर सभ्यता का विकास शील स्वरूप दिखाई देता है।

धोलावीरा सभ्यता के दूसरे चरण में कई बस्तियां बसाई गई थी, उनको इस चरण में हटा कर एक मैदान का निर्माण किया गया मैदान के उत्तर की तरफ जनसामान्य के लिए योजना अनुरूप शहर का निर्माण किया गया और नगर के चारों ओर सुरक्षा दीवार एवं प्रसाद के चारों दीवारों के मध्य भाग में चार प्रवेश द्वार का निर्माण भी किया गया।

नवीन निर्मित नगर के दोनों भागों के मध्य भाग के मध्य खुले मैदानों को रंग महल की संज्ञा दी गई थी। ऐसा अनुमान है कि इस मैदान का प्रयोग सार्वजनिक एवं सामूहिक उत्सव में किया जाता रहा होगा।

ऐसा अनुमान है कि सभ्यता का तीसरा चरण लगभग 300 वर्षों तक रहा होगा और इस सभ्यता के तीसरे चरण के अंतिम दौर में विनाशकारी भूकंप आए जिनके कारण नगर ध्वस्त हो गए और कई जगहों पर व्यापक टूट-फूट और विध्वंश के प्रमाण मिलते हैं।

लेकिन आर्थिक रूप से संपन्न होने के कारण इस सभ्यता के लोगों ने अति शीघ्र नगर का पुनर्निर्माण कर लिया था, इस पुनर्निर्माण से नगर में बड़ा परिवर्तन आया और नगर का एक तीसरे भाग का भी निर्माण हुआ तीसरे भाग के निर्माण के बाद पुराने शहर को मध्यम नगर एवं नए जुड़े भाग को अवम नाम से पुकारा जाता था।

सभ्यता के इस तीसरे चरण में चित्रित मृदभांड ( मिट्टी के बर्तन ) प्रयोग किए गए जो विशुद्ध रूप से हड़प्पा सभ्यता से ही संबंधित थे।

हड़प्पा सभ्यता से संबंधित मुद्राएं एवं घनाकार तौलने के बाट भी पहली बार यहां पर दिखाई देते हैं ।बर्तनों पर हड़प्पा लिपि के भी संकेत मिलते हैं धोलावीरा की संस्कृति के इस चरण में हड़प्पा संस्कृति की विकासोन्मुख प्रक्रिया स्पष्ट रूप से परिलक्षित हुई है।

चतुर्थ चरण

Dholavira संस्कृति की समृद्धि और वैभव इसके चौथे चरण में दिखाई देती है। हड़प्पा संस्कृति से प्राप्त सभी महत्वपूर्ण वस्तुएं सभ्यता के इस चरण में यहां से प्राप्त हुई है जैसे कलात्मक मृदभांड विशिष्ट कलात्मक मुद्राएं

तौल के बाट, लिपिगत लेख, शंख, तांबे व मिट्टी की चूड़ियां, उपरत्न, सेलखड़ी, तांबे, सोने और पक्की मिट्टी के मनके शंख के बने विविध आभूषण सोने के छल्ले, मिट्टी की गाड़ियां, बैल व अन्य खिलौने साथ ही हड़प्पा इस शैली में निर्मित मानव आकृतियां यहां से प्राप्त हुई है।

यहां से इस चरण में प्राप्त होने वाली कलाकृतियां हड़प्पा और मोहनजोदड़ो से प्राप्त कलाकृतियों से कुछ भिन्न है।

धोलावीरा की कलाकृतियों की विशेषता चूना पत्थर से निर्मित स्थापत्य नमूनों के कुछ अवशेष जिसमे पीली व बैंगनी रंग की धारियां निर्मित है, दिखाई देती है।

पांचवा चरण

यह चरण धोलावीरा सभ्यता के पतन का चरण है जिसमें इस सभ्यता के पतन के लक्षण दिखाई देते हैं, जिसमें सर्वप्रथम नगर आयोजन एवं स्थापत्य के क्षेत्र में गिरावट आई संभवत इस गिरावट का महत्वपूर्ण कारण था प्रशासनिक अव्यवस्था।

सभ्यता के पतन का आरंभ महाप्रसाद से शुरू होता है जो संभवत शक्ति के बड़े केंद्र थे अनुमान है कि सभ्यता के पांचवें चरण में संपन्न वर्णिक और शिल्पी समूह के परिवार बेहतर अवसर की तलाश में नगर छोड़कर दूसरे स्थानों पर जाने लगे धोलावीरा संस्कृति के पतन का समय 2200 ईसा पूर्व से 2000 इसा पूर्व तक अनुमानित है।

सभ्यता के पतन शुरू होने के कुछ समय के बाद उत्तर हड़प्पा कालीन लोगों ने धोलावीरा के स्थलों पर अपनी बस्तियां बसाई यहां से मिली मोहरों के स्वरूप में अपने पूर्ववर्ती नगरों से प्राप्त मोहरों की अपेक्षा कुछ परिवर्तन अवश्य दिखाई देता है।

यह मोहरे आकार में छोटी और चित्रांकन हीन हो गई थी पर इन पर लिपि चिन्ह बने हुए मिलते हैं यहां से प्राप्त बाटों में अधिकांश संख्या ऐसे बांटो की है जिन्हें ठीक से खींच कर बनाया गया था।

कुम्हार कला के अंतर्गत प्राप्त पतले सुंदर चमकीले बर्तन मिले हैं जो दक्षिणी राजस्थान की आहाड़ या बनास संस्कृति से संबंधित है और यहां प्राप्त बर्तन झुकड़शैली के भी प्राप्त हुए हैं।

धोलावीरा के अतिरिक्त इसके समकालीन सुरकोटड़ा और देशलपुर से भी हड़प्पा कालीन लेख युक्त मोहरे प्राप्त हुए हैं।

अन्यत्र किसी अन्य स्थल से इस प्रकार की मोहरे नहीं मिलती है।

छठा चरण

100 वर्षों तक अस्तित्व में रही धोलावीरा का छठवें चरण मे पूर्व चरणों से कई परिवर्तन के लक्षण दिखाई देते हैं। इस चरण में मकान सीधे और एक दूसरे से जोड़कर बनाए जाने लगे और मकानों के बीच की गलियों को पूर्णता समाप्त कर दिया गया।

इस चरण में निर्मित मकानों में हड़प्पा कालीन मकानों में प्रयोग किए गए पत्थरों का उपयोग किया गया है।

ऐसा अनुमान है कि इस समय बनने वाले मकानों की ऊंचाई कम एवं छत लकड़ी पेड़ की शाखा और घास फूस से बनाई जाने लगी थी। शंख और उप रत्नों के आभूषण शायद इस समय व्यापक स्तर पर निर्मित किए जाने लगे थे।

सातवाँ चरण

धोलावीरा के सातवें और अंतिम चरण की भी विशिष्ट पहचान हुई है इस चरण में लोग आयताकार मकानों के स्वरूप को त्याग कर वृत्ताकार मकान बनाने लगे थे जिन्हे बुंगा या कुंभा कहा जाता था यह मकान लकड़ी एवं घास फूस के बनाए गए थे दीवारों को पत्थर से बनाया गया था ।

अनुमान है कि 2 से 3 फीट की पत्थर की दीवार के ऊपर लकड़ी का गोलाकार ढांचा स्थापित कर इसके ऊपर लकड़ी और घास फूस की छत  बनाई जाती थी।

अपने इस अंतिम चरण में धोलावीरा सभ्यता नगर सभ्यता से ग्रामीण सभ्यता में परिवर्तित हो गई थी। इस प्रकार 1000 वर्षों तक अस्तित्व में रहने वाली धौलावीरा संस्कृति उजड़ने के बाद पुनः फिर नहीं बस सकी।

धौलावीरा सभ्यता की स्थापत्य विशेताएँ :–

Dholavira नगर का पूर्व से पश्चिम का विस्तार 771 मीटर और उत्तर से दक्षिण का विस्तार लगभग 617 मीटर है प्रासाद के अंदर पूर्व से पश्चिम में विस्तार औसतन 114 मीटर एवं उत्तर से दक्षिण में 92 मीटर है।

प्रासाद का उत्तरी प्रवेश द्वार 16 x 11 मीटर नाप का है, इसमें जाने के लिए 79 मीटर लंबा और 9 मीटर चौड़ा रास्ता बनाया गया था जो ऊपर जाते जाते चौड़ा होकर 12 मीटर का हो जाता है।

नगर के मध्यम व एवं भाग में समकोण पर काटती थी रास्ते आवासी खंडों को कई भागों में बांटते हैं, यहां से प्राप्त मकानों के अंदर अनेक कमरे रसोईघर, स्नान गृह एवं एक प्रांगण मिला है। गंदा पानी नलीयों के माध्यम से बह कर सड़क पर रखे गए मटको में इकट्ठा होता था।

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धार्मिक सम्प्रदाय :–

यहां मिली कब्रें अपने आप में अनोखी हैं अधिकांश कब्रे आयताकार आकार में उत्तर से दक्षिण एवं पूर्व से पश्चिम दिशा की ओर मिलती है। पत्थर की अधिकता के कारण यहां की कब्रों के चारों तरफ विशाल शिलाखंड लगे हुए हैं।

अब तक यहां से करीब 6 विभिन्न तरह की कब्रें प्राप्त हुई हैं जिनमें से एक में भी नर कंकाल नहीं मिलते हैं जो पुरातात्विक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

यहां से प्राप्त एक कब्र में रखे गए मिट्टी के बर्तन के अंदर कुछ राख व कोयले के टुकड़े मिलते हैं जिनसे यह अनुमान लगाया गया है कि संभवत अग्नि और दाह संस्कार के बाद बचे हुए अस्थियों को कब्र में रखा जाता था।

यहां से प्राप्त अनेक प्रकार की कब्रों के अवशेषों से यह संकेत मिलता है कि शायद यहां पर निवास करने वाले विभिन्न परंपराओं को मानने वाले एवं अनेक धार्मिक संप्रदायों के लोग रहे होंगे। धोलावीरा हड़प्पा सभ्यता का ही भाग है जो इस सभ्यता के बाद क्रमिक रूप से विकसित हुई।

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2 thoughts on “Dholavira. हड़प्पा सभ्यता के पूरा स्थलों में एक नवीन कड़ी ।”

  1. आपका आलेख पढ़ा । बहुत ही अच्छी जानकारी मिली । कृपया छत्तीसगढ़ पाठ्य पुस्तक निगम के प्रश्नोंत्तर के लिए नीचे लिंक पर क्लिक कीजिए !
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